आजाद भारत ने 71 साल पहले आज ही जीता था अपना पहला ओलंपिक गोल्ड

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भारत लंदन में आयोजित हो रहे ओलिंपिक खेलों में पुरुष हॉकी स्पर्धा के फाइनल में था आजाद भारत का पहला ओलंपिक गोल्ड मेडल था खेल डेस्क. 71 साल पहले भारतीय हॉकी टीम ने आज ही के दिन एक ऐसी अनोखी गौरवगाथा लिखी थी जिस पर हमेशा हर भारतीय को फख्र महूसस होगा. 12 अगस्त 1948 वो अतीत की बीती हुई तारीख जो हमेशा आपके जेहन में जिंदा रहेगी.
15 अगस्त 1948 को जब भारत अपना पहला स्वतंत्रता दिवस जश्न मनाने जा रहा था. उससे ठीक 3 दिन पहले यानि 12 अगस्त 1948 को भारतीय हॉकी टीम ने सदियों तक हम पर राज करने वाले देश के सामने तिरंगा लहराकर देश की पहली आजादी का जश्न दोगुना कर दिया था.
भारत लंदन में आयोजित हो रहे ओलिंपिक खेलों में पुरुष हॉकी स्पर्धा के फाइनल में था. यहां फाइनल में भारत का मुकाबला ब्रिटिश टीम से था. लंदन के वेम्बली स्टेडियम में भारत ने 1948 के ओलंपिक फाइनल में ब्रिटेन को 4-0 से हराकर गोल्ड मेडल अपने नाम कर लिया था.
यह आजाद भारत का पहला ओलंपिक गोल्ड मेडल था. पूरे भारत के लिए इससे बड़ी खुशी और क्या हो सकती थी कि हमारे देश की हॉकी टीम ने आजादी की पहली वर्षगांठ से पहले देश को सबसे नायाब जीत का तोहफा दिया.
भारत ने वैसे तो लगातार चौथी बार ओलंपिक गोल्ड जीता था. लेकिन 1928, 1932 और 1936 के ओलंपिक में गोल्ड जीतने वाला भारत तब तक अपने तिरंगे झंडे को सलाम नहीं करता था और न ही जन गण मन बजता था.
इससे पहले भारत ने ओलंपिक गेम्स में ब्रिटिश इंडिया के बैनर तले सोने का तमगा हासिल किया था. जब पहली दफा आजाद भारत का झंडा विदेशी जमीन पर लहराया, तो कई खिलाड़ियों ने उन लोगों के सपनों को सच होते हुए देखा जो कहते थे कि एक दिन भारत जरूर आजाद होगा.
एक दिन अपनी सरकार होगी, अपना झंडा होगा. इस जीत के मायने इस बात से समझिए कि इससे पहले ब्रिटिश टीम एक बार भारत के खिलाफ यह कहकर खेलने से मना कर चुकी थी कि भारत उसके उपनिवेशों में से एक रहा है, तो इंग्लिश टीम भारत के खिलाफ नहीं खेलेंगी.
लेकिन इस बार ग्रेट ब्रिटेन की टीम ऐसा नहीं कर सकती थी क्योंकि अब भारत आजाद हो चुका था और उसके खिलाड़ियों ने ब्रिटिश टीम के खिलाफ हॉकी खेली. इस तरह आजाद भारत ने 1948 में अपने पहले ओलिंपिक गोल्ड पर कब्जा जमाया.
इन ओलिंपिक खेलों में सब-इंस्पेक्टर बलबीर सिंह ने अपना डेब्यू किया था. इन ओलिंपिक खेलों में बलबीर सिंह भारत के स्टार बन चुके थे. सेंटर फॉरवर्ड पर खेलने वाले बलबीर सिंह ने फाइनल मैच में 2 गोल किए. वहीं त्रिलोचन सिंह और पत जनसेन ने भी 1-1 गोल दागा.
इस शानदार जीत के नायक बलबीर सिंह ने अपने एक इंटरव्यू में कहा, ‘भले ही यह बीते जमाने की बात हो, लेकिन आज भी ऐसा महसूस होता है कि जैसे यह कल की ही बात हो. बलबीर सिंह ने कहा कि मैच जीतने के बाद हमारा तिरंगा धीरे-धीरे ऊपर चढ़ रहा था.
इसके साथ-साथ हमारा राष्ट्र गान भी बज रहा था. यह नजारा देख मुझे अपने पिता के शब्द थे, हमारा झंडा, हमारा देश’ उनके इन शब्दों को सुनकर मैं समझ चुका था कि इस खूबसूरत लम्हें के मेरे लिए क्या मायने हैं. मुझे ऐसा महसूस हो रहा था कि मैं भी मैदान से ऊपर उठ रहा हूं.
भारतीय हॉकी टीम ने 1928 से 1956 तक लगातार 6 बार गोल्ड मेडल पर अपने नाम किए. इसके बाद 1964 में सातवीं बार गोल्ड हासिल किया. आखिरी बार 1980 में भारत ने स्पेन को हराकर ओलंपिक में गोल्ड मेडल पर कब्जा जमाया था.
हालांकि उसके बाद से अब तक भारत की हॉकी टीम ओलंपिक खेलों में कोई खास चमत्कार नहीं कर पाई है. लेकिन आजाद भारत की हॉकी टीम का पहली दफा इंग्लिश टीम को उसके घर में रौंदकर गोल्ड मेडल जीतने का कारनामा वाकई अद्भुत है.
इससे जुड़ी हुई एक और दिलचस्प बात ये है कि भारत-पाकिस्तान का बटवांरा हो चुका था. लेकिन 1948 ओलंपिक्स में दोनों देशों के सामने एक टीम बनाने का प्रस्ताव रखा गया. मगर दोनों ही देशों ने इस सुझाव पर अमल करने में कोई दिलचस्पी नहीं दिखाई.
एक ओर जहां भारतीय हॉकी टीम ने इस ओलम्पिक में गोल्ड मेडल जीता वहीं पाकिस्तान की हॉकी टीम ने अपना मैच ड्रॉ खेलने और फिर नीदरलैंड्स से 4-1 से हारने के बाद टूर्नामेंट में चौथे नंबर पर रही.
इसके बाद भी भारत ने 4 बार फिर ओलंपिक चैंपियन बना. लेकिन आजादी के 71 साल बाद भी ओलंपिक का वो गोल्ड इसलिए अहम है क्योंकि 200 साल तक हिंदुस्तानियों पर हुकुमत करने वाले देश को भी भारत के रूतबे का अंदाजा हो चुका था.
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