बस्तर का दशहरा है सबसे अलग… 600 सालों से खास कारण से रहा चर्चा में..

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केशव केदारनाथ शर्मा दशहरा का ऐसा पर्व जिसमें ना तो राम की पूजा होती है और ना ही रावण का वध, और ना ही किसी महाकाब्य की काब्यकथा का समावेश होता है. छत्तीसगढ़ का अनूठा और सर्वश्रेष्ठ पर्व बस्तर दशहरा है.  लगभग 6 सौ वर्ष से राम और रावण के अस्तित्व के बगैर मनाये जा रहे इस पर्व में 75 दिनों का उत्सव का माहौल होता है, जो कि काकतीय राजाओं की कुलदेवी मां दंतेश्वरी को समर्पित होता है.  श्रावण मास की हरेली अमावस्या से प्रारंभ होकर शुक्ल त्रयोदशी तक 75 दिन तक चलने वाले इस उत्सव की शुरुआत ‘पाटजात्रा’ नामक रस्म से होती है. इसमें हरेली अमावस्या को माचकोट के जंगल से लाई गई लकड़ी ठुरलू खोटला से शुरु किया जाता है.  बिलोरी जंगल से साल लकड़ी का गोला लाकर काष्ठपूजा कर सात मांगुर मछलियों की बलि और लाई-चना, देवी के नाम अर्पित किया जाता है.  इस रस्म के बाद बिरिंगपाल गांव के ग्रामीण सिरासार भवन में सरई पेड़ की टहनी को स्थापित कर डेरीगड़ाई रस्म पूरी कर विशाल रथ का निर्माण करते हैं.  इसके बाद शुरु होता है बस्तर दशहरा का प्रथम चरण….जिसे ‘ काछिनगादी’ कहा जाता है. काछिनगादी, मिरगान अर्थात माहरा जाति की कुलदेवी है.  इन्हीं देवी की अनुमति लेकर राजा दलपत ने अश्विन अमावस्या को अनुमति लेकर दशहरा उत्सव प्रारंभ किया था. इस रस्म में मिरगान जाति की एक हरिजन नाबालिग कुंवारी कन्या चुनी जाति है.  इसे कांटो की गद़दी पर बैठाया जाता है. मान्यता है कि पूजा पाठ के बाद इस कन्या पर काछिन देवी का आवेश आता है जिनसे दशहरा की अनुमति और सहमति ली जाती है.  इसके बाद सिरहासार में प्राचीन टाउनहाल में जोगी बिठाई की रस्म होती है. यह बस्तर का नवरात्रि पर्व है. जिसमें हाल के बीच में एक गड्ढा बनाकर हल्बा जनजाति का एक युवक लगातार बिना कुछ खाये पीये नौ दिनों तक योगासन में बैठा रहता है.  दूसरे दिन फूल रथ यात्रा प्रारंभ हो जाती है. आश्विन शुक्ल द्वितिया से लेकर शुक्ल सप्तमी तक चलने वाले इस रथ में देवी दंतेश्वरी का छत्र होता है. इस रथ पर राजा बैठते है, साथ में एक पूजारी होता है.  पहले 12 पहियों वाला एक रथ होता था परंतु असुविधा को देखते हुए इसे आठ और चार पहियों वाले दो रथ में विभाजित कर दिया गया.  दुर्गा अष्टमी के दिन बस्तर दशहरा का निशा यात्रा का कार्यक्रम होता है. इस यात्रा में जुलूस नगर के पूजा मण्डप तक पहुंचता है. नवमें दिन ‘ मावली परघाव ‘ अर्थात देवी की स्थापना होती है.  इस रस्म में दंतेवाड़ा से दंतेश्वरी की डोली में लाई गई मावली देवी की मूर्ति का स्वागत किया जाता है. इस मूर्ति का निर्माण नये कपड़े में चंदन का लेप देकर पुष्पाच्छादित कर किया जाता है. इस दिन समाधिस्थ जोगी को समारोह पूर्वक उठाकर उसे सम्मानित किया जाता है.  मावली माता को निमंत्रण देकर दशहरा पर्व में सम्मिलित होने के लिए इनकी डोली को राजा, कुंवर, राजगुरु और पुजारी कंधा देकर ग्रामीणों के साथ जगदलपुर के दंतेश्वरी मंदिर तक पहुंचाते हैं.  विजयादशमी के दिन भीतर रैनी और एकादशी के दिन बाहर रैनी होता है. दोनों ही दिन आठ पहियों वाला एक विशाल रथ चलता है. इस रथ को चुराकर ले जाते और वापस लाने का दृश्य अत्यंत रोचक और रोमांचक होता है.  इस निशाजात्रा रस्म में दर्जनों अभिमंत्रित बकरों की बलि दी जाती है. पहले यह बकरे राजा द्वारा दिये जाते थे और अब जिला प्रशासन इसे मुहैया कराता है.  इसमें बकरे के कान में पुजारी कुछ मंत्र पड़ता है और बकरे शांत निर्जीव से हो जाते हैं. यहां पर पुजारी, भक्त तथा राज परिवार के सदस्य मौजूद होते हैं. इसमें देवी-देवताओं को 16 कांवड़ भोग चढ़ाया जाता है.  बस्तर दशहरा के अंतिम पड़ाव में द्वादशी को ‘मुड़िया दरबार ‘ लगता है. जिसमें गांव-गांव से आये सभी मांझी-मुखिया और ग्रामीणों की समस्याओं का समाधान किया जाता है.  पहले इसका निराकरण राजा करता था अब प्रशासनिक अधिकारी इस परंपरा का निर्वाह करते हैं. इसके साथ ही आश्विन शुक्ल त्रयोदशी को ‘ओहाड़ी’ रस्म के तहत गांव-गांव से आये देवी देवताओं को परंपरा के अनुसार बिदाई दी जाती है.  यह बड़ा ही भावपूर्ण होता है. दंतेवाड़ा की दंतेवश्वरी माई की डोली व छत्र को नजराने व सम्मान के साथ उनके मूल स्थान के लिए विदा कर दिया जाता है. मावली माता की बिदाई को गंगामुड़ा यात्रा कहा जाता है.  पूरा लेख पढ़ें युगवार्ता के 13 अक्टूबर अंक में… शेयर करेंLike this:Like Loading…