विदेशों में भी भारतीय संस्कृति को चार चांद लगा रहा है ब्रज का चरकुला नृत्य

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राधारानी की नानी ने चरकुला नृत्य कर दी थी ब्रज को सौगात राधारानी की ननिहाल में 11 मार्च को आयोजन की तैयारियां प्रारंभ मथुरा, 29 फरवरी(हि.स.). ‘‘सब जग होरी, ब्रज में हौरा’ की कहावत सुनते ही बरसाना-नंदगांव की लठामार होरी और हुरियारिन-हुरियारे की प्रेमभरी लाठियां एवं हंसी ठिठोली की याद आने लग जाती है, ब्रज की होली का मुख्य आकर्षण होता है. चरकुला नृत्य जो ब्रज की संस्कृति को चार चांद लगा देता है. कहा जाता है कि बरसाना में जब वृषभान दुलारी की किलकारियां गूंजी तो उनकी नानी खुशी जताते हुए चुरकुला नृत्य किया था जो आज तक राधारानी के ननिहाल मुखराई गांव में आयोजित हो रहा है. इस बार 11 मार्च को चरकुला नृत्य महोत्सव का आयोजन बरसाना के गांव मुखराई में देखने को मिलेगा. जहां हुरियारें ‘जुग-जुग जीयो नाचन हारी…जाकी रूठ गई है नारि मनावत डोलै घरवारौ.. गाकर उत्साहित नजर आती है. पारंपरिक परिधानों से सजे पुरुषों के नगाड़ों एवं ढोल की थाप पर महिलाएं मिट्टी के सात घड़े और उनके ऊपर जलते दीयों के साथ पूरे लय एवं सुर में नृत्य करती हैं, तो ब्रज की एक अलग ही छटा नजर आती है. गौरतलब हो कि ब्रज होली महोत्सव में राधा-कृष्ण के अटूट प्रेम का जीता-जागता अनुभव बरसाना में होता है. आसमान में उड़ते सतरंगी गुलाल, हंसी ठिठोली में मीठी गालियों की छेड़छाड़, ढप नगाड़े की थाप पर गूंजते रसिया, सिर पर 108 दीपक रख नाचती हुरियारिन और नचाते हुरियारे संस्कृति और होली का यह अनूठा संगम राधारानी की ननिहाल मुखराई में देखने को मिलता है. इस महोत्सव का सुबह रंगों की होली के साथ शुरूआत होती है, दोपहर में हुरंगा और देररात तक चरकुला नृत्य के बाद समापन होता है. चरकुला नृत्य ब्रज संस्कृति की अद्भुत कला में शुमार है, 108 दीपों से सुसज्जित इस पुरातन कला के बिना ब्रज साहित्य और होली की परिभाषा अधूरी ही रह जाएगी. राधारानी के जन्म से जुड़ी इस अद्भुत परंपरा का ब्रज की मांटी ही नहीं बल्कि सात समंदर पार तक आकर्षण बना हुआ है, जिसे देखने के लिए विदेशी पर्यटक यहां पहुंच कर चुरकुला नृत्य करने वाली महिलाओं के साथ नाचने में मजबूर हो जाते है. यह अद्भुत चरकुला नृत्य महोत्सव 11 मार्च को बरसाना के मुखराई देखने को मिलेगा. जिसकी तैयारियों के लिए नगर पंचायत एवं ग्रामीण जी-जान से जुटे हुए है. चुरकुला नृत्य की धार्मिक मान्यता द्वापर युगीन चरकुला नृत्य की अनूठी और कलात्मक परंपरा गोवर्धन के समीपवर्ती गांव मुखराई से जुड़ी है. मुखराई गांव राधारानी की ननिहाल है, उनकी नानी का नाम मुखरा देवी है. धार्मिक मान्यता के अनुसार पिता वृषभान और माता कीरत कुमारी के बरसाना स्थित आंगन में राधारानी की किलकारियों से गूंज उठा. जब यह समाचार उनकी नानी मुखरा देवी ने सुना तो वह बहुत खुश हुई. मुखरा देवी ने समीप रखे रथ के पहिये पर 108 दीप रखे और प्रज्वलित कर नाचने लगीं. इसी नृत्य को चरकुला नृत्य के नाम से जाना जाता है. होली में ग्राम मुखराई में ग्रामीण महिलाएं 108 जलते दीपों के साथ प्रतिवर्ष चरकुला नृत्य कर परंपरा का निर्वहन करती हैं. महिलाएं जब नृत्य करती हैं तब हुरियारे लोक गीत जुग-जुग जीयो नाचन हारी…जाकी रूठ गई है नारि मनावत डोलै घरवारौ.. गाकर उत्साहित करते हैं. चरकुला नृत्य में 1845 में हुआ था परिवर्तन 1845 में गांव के प्यारेलाल बाबा ने नया रूप दिया. उन्होंने लकड़ी का घेरा, लोहे की थाल एवं लोहे की पत्ती और मिट्टी के 108 दीपक रख पांच मंजिला चरकुला बनाया था. ग्रामीण महिलाएं 108 जलते दीपकों के साथ इस चरकुला को सिर पर रख मदन मोहन जी मन्दिर के निकट नृत्य कर परंपरा का निर्वहन करती हैं. सन् 1930 से 1980 तक यह नृत्य लक्ष्मी देवी और असर्फी देवी ने किया. 1980 से पूर्व स्थिर था गांव की सीमा में, विदेशों में अब है पहचान मथुरा से 25 किमी दूर तहसील क्षेत्र का गांव मुखराई राधारानी की ननिहाल होने के कारण आस्था का प्रमुख केंद्र है. यहां श्रद्धालुओ का वर्ष भर लोगों का आवागमन बना रहता है. गांव की माटी में कई प्रतिभा भी जन्मी हैं जिन्होंने संगीत की साधना तथा चरकुला नृत्य से देश ही नही बल्कि विदेश में भी मुखराई को पहिचान दिलाई. चरकुला नृत्य को लेकर पहली विदेश जाने वाले कलाकारों में शामिल छगन लाल शर्मा के अनुसार 1980 से पहले यह नृत्य गांव की सीमा से बाहर नही जाता था. ग्रामीण अपनी परंपरा को बाहर ले जाने के पक्ष में नहीं थे. ग्रामीणों का तर्क था कि इस नृत्य को देखने लोग इसी गांव में आएं जिससे गांव का नाम रोशन हो. चरकुला नृत्य अब विदेशों में बना चुका है पहचान मुखराई गांव के मदन लाल शर्मा और छगन लाल शर्मा चरकुला नृत्य के लिए लक्ष्मी देवी के साथ पहली बार मारीशस गए. इसके बाद तो नृत्य की डिमांड विदेशों में बढ़ती चली गई. चरकुला की टीम जापान, इंडोनेशिया, रूस, चीन, सिंगापुर, आस्ट्रेलिया तक इस अद्भुत कला और ब्रज की संस्कृति को उजागर करते हुए शुमार बनी हुई है. पूर्व प्रधान चौधरी मानपाल सिंह ने बताया कि इस महोत्सव में देश ही नहीं अपितु विदेश से भी लोग महोत्सव का आनंद लेने आते हैं. सुबह रंगों की होली के साथ शुरू होता यह महोत्सव दोपहर में हुरंगा और देर रात तक चरकुला नृत्य के बाद समापन होता है. ../महेश/राजेश Like this:Like Loading… Related